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1+मधुशाला
2+मृदु भावों के अंगूरों की आज बना लाया हाला,
3+प्रियतम, अपने ही हाथों से आज पिलाऊँगा प्याला,
4+पहले भोग लगा लूँ तेरा फिर प्रसाद जग पाएगा,
5+सबसे पहले तेरा स्वागत करती मेरी मधुशाला।।१।
6+
7+प्यास तुझे तो, विश्व तपाकर पूर्ण निकालूँगा हाला,
8+एक पाँव से साकी बनकर नाचूँगा लेकर प्याला,
9+जीवन की मधुता तो तेरे ऊपर कब का वार चुका,
10+आज निछावर कर दूँगा मैं तुझ पर जग की मधुशाला।।२।
11+
12+प्रियतम, तू मेरी हाला है, मैं तेरा प्यासा प्याला,
13+अपने को मुझमें भरकर तू बनता है पीनेवाला,
14+मैं तुझको छक छलका करता, मस्त मुझे पी तू होता,
15+एक दूसरे की हम दोनों आज परस्पर मधुशाला।।३।
16+
17+भावुकता अंगूर लता से खींच कल्पना की हाला,
18+कवि साकी बनकर आया है भरकर कविता का प्याला,
19+कभी न कण-भर खाली होगा लाख पिएँ, दो लाख पिएँ!
20+पाठकगण हैं पीनेवाले, पुस्तक मेरी मधुशाला।।४।
21+
22+मधुर भावनाओं की सुमधुर नित्य बनाता हूँ हाला,
23+भरता हूँ इस मधु से अपने अंतर का प्यासा प्याला,
24+उठा कल्पना के हाथों से स्वयं उसे पी जाता हूँ,
25+अपने ही में हूँ मैं साकी, पीनेवाला, मधुशाला।।५।
26+
27+मदिरालय जाने को घर से चलता है पीनेवला,
28+'किस पथ से जाऊँ?' असमंजस में है वह भोलाभाला,
29+अलग-अलग पथ बतलाते सब पर मैं यह बतलाता हूँ -
30+'राह पकड़ तू एक चला चल, पा जाएगा मधुशाला।'। ६।
31+
32+चलने ही चलने में कितना जीवन, हाय, बिता डाला!
33+'दूर अभी है', पर, कहता है हर पथ बतलानेवाला,
34+हिम्मत है न बढूँ आगे को साहस है न फिरुँ पीछे,
35+किंकर्तव्यविमूढ़ मुझे कर दूर खड़ी है मधुशाला।।७।
36+
37+मुख से तू अविरत कहता जा मधु, मदिरा, मादक हाला,
38+हाथों में अनुभव करता जा एक ललित कल्पित प्याला,
39+ध्यान किए जा मन में सुमधुर सुखकर, सुंदर साकी का,
40+और बढ़ा चल, पथिक, न तुझको दूर लगेगी मधुशाला।।८।
41+
42+मदिरा पीने की अभिलाषा ही बन जाए जब हाला,
43+अधरों की आतुरता में ही जब आभासित हो प्याला,
44+बने ध्यान ही करते-करते जब साकी साकार, सखे,
45+रहे न हाला, प्याला, साकी, तुझे मिलेगी मधुशाला।।९।
46+
47+सुन, कलकल़ , छलछल़ मधुघट से गिरती प्यालों में हाला,
48+सुन, रूनझुन रूनझुन चल वितरण करती मधु साकीबाला,
49+बस आ पहुंचे, दुर नहीं कुछ, चार कदम अब चलना है,
50+चहक रहे, सुन, पीनेवाले, महक रही, ले, मधुशाला।।१०।
51+
52+जलतरंग बजता, जब चुंबन करता प्याले को प्याला,
53+वीणा झंकृत होती, चलती जब रूनझुन साकीबाला,
54+डाँट डपट मधुविक्रेता की ध्वनित पखावज करती है,
55+मधुरव से मधु की मादकता और बढ़ाती मधुशाला।।११।
56+
57+मेंहदी रंजित मृदुल हथेली पर माणिक मधु का प्याला,
58+अंगूरी अवगुंठन डाले स्वर्ण वर्ण साकीबाला,
59+पाग बैंजनी, जामा नीला डाट डटे पीनेवाले,
60+इन्द्रधनुष से होड़ लगाती आज रंगीली मधुशाला।।१२।
61+
62+हाथों में आने से पहले नाज़ दिखाएगा प्याला,
63+अधरों पर आने से पहले अदा दिखाएगी हाला,
64+बहुतेरे इनकार करेगा साकी आने से पहले,
65+पथिक, न घबरा जाना, पहले मान करेगी मधुशाला।।१३।
66+
67+लाल सुरा की धार लपट सी कह न इसे देना ज्वाला,
68+फेनिल मदिरा है, मत इसको कह देना उर का छाला,
69+दर्द नशा है इस मदिरा का विगत स्मृतियाँ साकी हैं,
70+पीड़ा में आनंद जिसे हो, आए मेरी मधुशाला।।१४।
71+
72+जगती की शीतल हाला सी पथिक, नहीं मेरी हाला,
73+जगती के ठंडे प्याले सा पथिक, नहीं मेरा प्याला,
74+ज्वाल सुरा जलते प्याले में दग्ध हृदय की कविता है,
75+जलने से भयभीत न जो हो, आए मेरी मधुशाला।।१५।
76+
77+बहती हाला देखी, देखो लपट उठाती अब हाला,
78+देखो प्याला अब छूते ही होंठ जला देनेवाला,
79+'होंठ नहीं, सब देह दहे, पर पीने को दो बूंद मिले'
80+ऐसे मधु के दीवानों को आज बुलाती मधुशाला।।१६।
81+
82+धर्मग्रन्थ सब जला चुकी है, जिसके अंतर की ज्वाला,
83+मंदिर, मसजिद, गिरिजे, सब को तोड़ चुका जो मतवाला,
84+पंडित, मोमिन, पादिरयों के फंदों को जो काट चुका,
85+कर सकती है आज उसी का स्वागत मेरी मधुशाला।।१७।
86+
87+लालायित अधरों से जिसने, हाय, नहीं चूमी हाला,
88+हर्ष-विकंपित कर से जिसने, हा, न छुआ मधु का प्याला,
89+हाथ पकड़ लज्जित साकी को पास नहीं जिसने खींचा,
90+व्यर्थ सुखा डाली जीवन की उसने मधुमय मधुशाला।।१८।
91+
92+बने पुजारी प्रेमी साकी, गंगाजल पावन हाला,
93+रहे फेरता अविरत गति से मधु के प्यालों की माला'
94+'और लिये जा, और पीये जा', इसी मंत्र का जाप करे'
95+मैं शिव की प्रतिमा बन बैठूं, मंदिर हो यह मधुशाला।।१९।
96+
97+बजी न मंदिर में घड़ियाली, चढ़ी न प्रतिमा पर माला,
98+बैठा अपने भवन मुअज्ज़िन देकर मस्जिद में ताला,
99+लुटे ख़जाने नरपितयों के गिरीं गढ़ों की दीवारें,
100+रहें मुबारक पीनेवाले, खुली रहे यह मधुशाला।।२०।
101+
102+बड़े बड़े परिवार मिटें यों, एक न हो रोनेवाला,
103+हो जाएँ सुनसान महल वे, जहाँ थिरकतीं सुरबाला,
104+राज्य उलट जाएँ, भूपों की भाग्य सुलक्ष्मी सो जाए,
105+जमे रहेंगे पीनेवाले, जगा करेगी मधुशाला।।२१।
106+
107+सब मिट जाएँ, बना रहेगा सुन्दर साकी, यम काला,
108+सूखें सब रस, बने रहेंगे, किन्तु, हलाहल औ' हाला,
109+धूमधाम औ' चहल पहल के स्थान सभी सुनसान बनें,
110+जगा करेगा अविरत मरघट, जगा करेगी मधुशाला।।२२।
111+
112+भुरा सदा कहलायेगा जग में बाँका, मदचंचल प्याला,
113+छैल छबीला, रसिया साकी, अलबेला पीनेवाला,
114+पटे कहाँ से, मधु औ' जग की जोड़ी ठीक नहीं,
115+जग जर्जर प्रतिदन, प्रतिक्षण, पर नित्य नवेली मधुशाला।।२३।
116+
117+बिना पिये जो मधुशाला को बुरा कहे, वह मतवाला,
118+पी लेने पर तो उसके मुह पर पड़ जाएगा ताला,
119+दास द्रोहियों दोनों में है जीत सुरा की, प्याले की,
120+विश्वविजयिनी बनकर जग में आई मेरी मधुशाला।।२४।
121+
122+हरा भरा रहता मदिरालय, जग पर पड़ जाए पाला,
123+वहाँ मुहर्रम का तम छाए, यहाँ होलिका की ज्वाला,
124+स्वर्ग लोक से सीधी उतरी वसुधा पर, दुख क्या जाने,
125+पढ़े मर्सिया दुनिया सारी, ईद मनाती मधुशाला।।२५।
126+
127+एक बरस में, एक बार ही जगती होली की ज्वाला,
128+एक बार ही लगती बाज़ी, जलती दीपों की माला,
129+दुनियावालों, किन्तु, किसी दिन आ मदिरालय में देखो,
130+दिन को होली, रात दिवाली, रोज़ मनाती मधुशाला।।२६।
131+
132+नहीं जानता कौन, मनुज आया बनकर पीनेवाला,
133+कौन अपिरिचत उस साकी से, जिसने दूध पिला पाला,
134+जीवन पाकर मानव पीकर मस्त रहे, इस कारण ही,
135+जग में आकर सबसे पहले पाई उसने मधुशाला।।२७।
136+
137+बनी रहें अंगूर लताएँ जिनसे मिलती है हाला,
138+बनी रहे वह मिटटी जिससे बनता है मधु का प्याला,
139+बनी रहे वह मदिर पिपासा तृप्त न जो होना जाने,
140+बनें रहें ये पीने वाले, बनी रहे यह मधुशाला।।२८।
141+
142+सकुशल समझो मुझको, सकुशल रहती यदि साकीबाला,
143+मंगल और अमंगल समझे मस्ती में क्या मतवाला,
144+मित्रों, मेरी क्षेम न पूछो आकर, पर मधुशाला की,
145+कहा करो 'जय राम' न मिलकर, कहा करो 'जय मधुशाला'।।२९।
146+
147+सूर्य बने मधु का विक्रेता, सिंधु बने घट, जल, हाला,
148+बादल बन-बन आए साकी, भूमि बने मधु का प्याला,
149+झड़ी लगाकर बरसे मदिरा रिमझिम, रिमझिम, रिमझिम कर,
150+बेलि, विटप, तृण बन मैं पीऊँ, वर्षा ऋतु हो मधुशाला।।३०।
151+
152+तारक मणियों से सज्जित नभ बन जाए मधु का प्याला,
153+सीधा करके भर दी जाए उसमें सागरजल हाला,
154+मत्त समीरण साकी बनकर अधरों पर छलका जाए,
155+फैले हों जो सागर तट से विश्व बने यह मधुशाला।।३१।
156+
157+अधरों पर हो कोई भी रस जिहवा पर लगती हाला,
158+भाजन हो कोई हाथों में लगता रक्खा है प्याला,
159+हर सूरत साकी की सूरत में परिवर्तित हो जाती,
160+आँखों के आगे हो कुछ भी, आँखों में है मधुशाला।।३२।
161+
162+पौधे आज बने हैं साकी ले ले फूलों का प्याला,
163+भरी हुई है जिसके अंदर पिरमल-मधु-सुरिभत हाला,
164+माँग माँगकर भ्रमरों के दल रस की मदिरा पीते हैं,
165+झूम झपक मद-झंपित होते, उपवन क्या है मधुशाला!।३३।
166+
167+प्रति रसाल तरू साकी सा है, प्रति मंजरिका है प्याला,
168+छलक रही है जिसके बाहर मादक सौरभ की हाला,
169+छक जिसको मतवाली कोयल कूक रही डाली डाली
170+हर मधुऋतु में अमराई में जग उठती है मधुशाला।।३४।
171+
172+मंद झकोरों के प्यालों में मधुऋतु सौरभ की हाला
173+भर भरकर है अनिल पिलाता बनकर मधु-मद-मतवाला,
174+हरे हरे नव पल्लव, तरूगण, नूतन डालें, वल्लरियाँ,
175+छक छक, झुक झुक झूम रही हैं, मधुबन में है मधुशाला।।३५।
176+
177+साकी बन आती है प्रातः जब अरुणा ऊषा बाला,
178+तारक-मणि-मंडित चादर दे मोल धरा लेती हाला,
179+अगणित कर-किरणों से जिसको पी, खग पागल हो गाते,
180+प्रति प्रभात में पूर्ण प्रकृति में मुखिरत होती मधुशाला।।३६।
181+
182+उतर नशा जब उसका जाता, आती है संध्या बाला,
183+बड़ी पुरानी, बड़ी नशीली नित्य ढला जाती हाला,
184+जीवन के संताप शोक सब इसको पीकर मिट जाते
185+सुरा-सुप्त होते मद-लोभी जागृत रहती मधुशाला।।३७।
186+
187+अंधकार है मधुविक्रेता, सुन्दर साकी शशिबाला
188+किरण किरण में जो छलकाती जाम जुम्हाई का हाला,
189+पीकर जिसको चेतनता खो लेने लगते हैं झपकी
190+तारकदल से पीनेवाले, रात नहीं है, मधुशाला।।३८।
191+
192+किसी ओर मैं आँखें फेरूँ, दिखलाई देती हाला
193+किसी ओर मैं आँखें फेरूँ, दिखलाई देता प्याला,
194+किसी ओर मैं देखूं, मुझको दिखलाई देता साकी
195+किसी ओर देखूं, दिखलाई पड़ती मुझको मधुशाला।।३९।
196+
197+साकी बन मुरली आई साथ लिए कर में प्याला,
198+जिनमें वह छलकाती लाई अधर-सुधा-रस की हाला,
199+योगिराज कर संगत उसकी नटवर नागर कहलाए,
200+देखो कैसों-कैसों को है नाच नचाती मधुशाला।।४०।
201+
202+वादक बन मधु का विक्रेता लाया सुर-सुमधुर-हाला,
203+रागिनियाँ बन साकी आई भरकर तारों का प्याला,
204+विक्रेता के संकेतों पर दौड़ लयों, आलापों में,
205+पान कराती श्रोतागण को, झंकृत वीणा मधुशाला।।४१।
206+
207+चित्रकार बन साकी आता लेकर तूली का प्याला,
208+जिसमें भरकर पान कराता वह बहु रस-रंगी हाला,
209+मन के चित्र जिसे पी-पीकर रंग-बिरंगे हो जाते,
210+चित्रपटी पर नाच रही है एक मनोहर मधुशाला।।४२।
211+
212+घन श्यामल अंगूर लता से खिंच खिंच यह आती हाला,
213+अरूण-कमल-कोमल कलियों की प्याली, फूलों का प्याला,
214+लोल हिलोरें साकी बन बन माणिक मधु से भर जातीं,
215+हंस मत्त होते पी पीकर मानसरोवर मधुशाला।।४३।
216+
217+हिम श्रेणी अंगूर लता-सी फैली, हिम जल है हाला,
218+चंचल नदियाँ साकी बनकर, भरकर लहरों का प्याला,
219+कोमल कूर-करों में अपने छलकाती निशिदिन चलतीं,
220+पीकर खेत खड़े लहराते, भारत पावन मधुशाला।।४४।
221+
222+धीर सुतों के हृदय रक्त की आज बना रक्तिम हाला,
223+वीर सुतों के वर शीशों का हाथों में लेकर प्याला,
224+अति उदार दानी साकी है आज बनी भारतमाता,
225+स्वतंत्रता है तृषित कालिका बलिवेदी है मधुशाला।।४५।
226+
227+दुतकारा मस्जिद ने मुझको कहकर है पीनेवाला,
228+ठुकराया ठाकुरद्वारे ने देख हथेली पर प्याला,
229+कहाँ ठिकाना मिलता जग में भला अभागे काफिर को?
230+शरणस्थल बनकर न मुझे यदि अपना लेती मधुशाला।।४६।
231+
232+पथिक बना मैं घूम रहा हूँ, सभी जगह मिलती हाला,
233+सभी जगह मिल जाता साकी, सभी जगह मिलता प्याला,
234+मुझे ठहरने का, हे मित्रों, कष्ट नहीं कुछ भी होता,
235+मिले न मंदिर, मिले न मस्जिद, मिल जाती है मधुशाला।।४७।
236+
237+सजें न मस्जिद और नमाज़ी कहता है अल्लाताला,
238+सजधजकर, पर, साकी आता, बन ठनकर, पीनेवाला,
239+शेख, कहाँ तुलना हो सकती मस्जिद की मदिरालय से
240+चिर विधवा है मस्जिद तेरी, सदा सुहागिन मधुशाला।।४८।
241+
242+बजी नफ़ीरी और नमाज़ी भूल गया अल्लाताला,
243+गाज गिरी, पर ध्यान सुरा में मग्न रहा पीनेवाला,
244+शेख, बुरा मत मानो इसको, साफ़ कहूँ तो मस्जिद को
245+अभी युगों तक सिखलाएगी ध्यान लगाना मधुशाला!।४९।
246+
247+मुसलमान औ' हिन्दू है दो, एक, मगर, उनका प्याला,
248+एक, मगर, उनका मदिरालय, एक, मगर, उनकी हाला,
249+दोनों रहते एक न जब तक मस्जिद मन्दिर में जाते,
250+बैर बढ़ाते मस्जिद मन्दिर मेल कराती मधुशाला!।५०।
251+
252+कोई भी हो शेख नमाज़ी या पंडित जपता माला,
253+बैर भाव चाहे जितना हो मदिरा से रखनेवाला,
254+एक बार बस मधुशाला के आगे से होकर निकले,
255+देखूँ कैसे थाम न लेती दामन उसका मधुशाला!।५१।
256+
257+और रसों में स्वाद तभी तक, दूर जभी तक है हाला,
258+इतरा लें सब पात्र न जब तक, आगे आता है प्याला,
259+कर लें पूजा शेख, पुजारी तब तक मस्जिद मन्दिर में
260+घूँघट का पट खोल न जब तक झाँक रही है मधुशाला।।५२।
261+
262+आज करे परहेज़ जगत, पर, कल पीनी होगी हाला,
263+आज करे इन्कार जगत पर कल पीना होगा प्याला,
264+होने दो पैदा मद का महमूद जगत में कोई, फिर
265+जहाँ अभी हैं मन्दिर मस्जिद वहाँ बनेगी मधुशाला।।५३।
266+
267+यज्ञ अग्नि सी धधक रही है मधु की भटठी की ज्वाला,
268+ऋषि सा ध्यान लगा बैठा है हर मदिरा पीने वाला,
269+मुनि कन्याओं सी मधुघट ले फिरतीं साकीबालाएँ,
270+किसी तपोवन से क्या कम है मेरी पावन मधुशाला।।५४।
271+
272+सोम सुरा पुरखे पीते थे, हम कहते उसको हाला,
273+द्रोणकलश जिसको कहते थे, आज वही मधुघट आला,
274+वेदिवहित यह रस्म न छोड़ो वेदों के ठेकेदारों,
275+युग युग से है पुजती आई नई नहीं है मधुशाला।।५५।
276+
277+वही वारूणी जो थी सागर मथकर निकली अब हाला,
278+रंभा की संतान जगत में कहलाती 'साकीबाला',
279+देव अदेव जिसे ले आए, संत महंत मिटा देंगे!
280+किसमें कितना दम खम, इसको खूब समझती मधुशाला।।५६।
281+
282+कभी न सुन पड़ता, 'इसने, हा, छू दी मेरी हाला',
283+कभी न कोई कहता, 'उसने जूठा कर डाला प्याला',
284+सभी जाति के लोग यहाँ पर साथ बैठकर पीते हैं,
285+सौ सुधारकों का करती है काम अकेले मधुशाला।।५७।
286+
287+श्रम, संकट, संताप, सभी तुम भूला करते पी हाला,
288+सबक बड़ा तुम सीख चुके यदि सीखा रहना मतवाला,
289+व्यर्थ बने जाते हो हिरजन, तुम तो मधुजन ही अच्छे,
290+ठुकराते हैं मंदिरवाले, पलक बिछाती मधुशाला।।५८।
291+
292+एक तरह से सबका स्वागत करती है साकीबाला,
293+अज्ञ विज्ञ में है क्या अंतर हो जाने पर मतवाला,
294+रंक राव में भेद हुआ है कभी नहीं मदिरालय में,
295+साम्यवाद की प्रथम प्रचारक है यह मेरी मधुशाला।।५९।
296+
297+बार बार मैंने आगे बढ़ आज नहीं माँगी हाला,
298+समझ न लेना इससे मुझको साधारण पीने वाला,
299+हो तो लेने दो ऐ साकी दूर प्रथम संकोचों को,
300+मेरे ही स्वर से फिर सारी गूँज उठेगी मधुशाला।।६०।
301+
302+कल? कल पर विश्वास किया कब करता है पीनेवाला
303+हो सकते कल कर जड़ जिनसे फिर फिर आज उठा प्याला,
304+आज हाथ में था, वह खोया, कल का कौन भरोसा है,
305+कल की हो न मुझे मधुशाला काल कुटिल की मधुशाला।।६१।
306+
307+आज मिला अवसर, तब फिर क्यों मैं न छकूँ जी-भर हाला
308+आज मिला मौका, तब फिर क्यों ढाल न लूँ जी-भर प्याला,
309+छेड़छाड़ अपने साकी से आज न क्यों जी-भर कर लूँ,
310+एक बार ही तो मिलनी है जीवन की यह मधुशाला।।६२।
311+
312+आज सजीव बना लो, प्रेयसी, अपने अधरों का प्याला,
313+भर लो, भर लो, भर लो इसमें, यौवन मधुरस की हाला,
314+और लगा मेरे होठों से भूल हटाना तुम जाओ,
315+अथक बनू मैं पीनेवाला, खुले प्रणय की मधुशाला।।६३।
316+
317+सुमुखी तुम्हारा, सुन्दर मुख ही, मुझको कन्चन का प्याला
318+छलक रही है जिसमें माणिक रूप मधुर मादक हाला,
319+मैं ही साकी बनता, मैं ही पीने वाला बनता हूँ
320+जहाँ कहीं मिल बैठे हम तुम़ वहीं गयी हो मधुशाला।।६४।
321+
322+दो दिन ही मधु मुझे पिलाकर ऊब उठी साकीबाला,
323+भरकर अब खिसका देती है वह मेरे आगे प्याला,
324+नाज़, अदा, अंदाजों से अब, हाय पिलाना दूर हुआ,
325+अब तो कर देती है केवल फ़र्ज़ - अदाई मधुशाला।।६५।
326+
327+छोटे-से जीवन में कितना प्यार करुँ, पी लूँ हाला,
328+आने के ही साथ जगत में कहलाया 'जानेवाला',
329+स्वागत के ही साथ विदा की होती देखी तैयारी,
330+बंद लगी होने खुलते ही मेरी जीवन-मधुशाला।।६६।
331+
332+क्या पीना, निर्द्वन्द न जब तक ढाला प्यालों पर प्याला,
333+क्या जीना, निश्चिंत न जब तक साथ रहे साकीबाला,
334+खोने का भय, हाय, लगा है पाने के सुख के पीछे,
335+मिलने का आनंद न देती मिलकर के भी मधुशाला।।६७।
336+
337+मुझे पिलाने को लाए हो इतनी थोड़ी-सी हाला!
338+मुझे दिखाने को लाए हो एक यही छिछला प्याला!
339+इतनी पी जीने से अच्छा सागर की ले प्यास मरुँ,
340+सिंधु-तृषा दी किसने रचकर बिंदु-बराबर मधुशाला।।६८।
341+
342+क्या कहता है, रह न गई अब तेरे भाजन में हाला,
343+क्या कहता है, अब न चलेगी मादक प्यालों की माला,
344+थोड़ी पीकर प्यास बढ़ी तो शेष नहीं कुछ पीने को,
345+प्यास बुझाने को बुलवाकर प्यास बढ़ाती मधुशाला।।६९।
346+
347+लिखी भाग्य में जितनी बस उतनी ही पाएगा हाला,
348+लिखा भाग्य में जैसा बस वैसा ही पाएगा प्याला,
349+लाख पटक तू हाथ पाँव, पर इससे कब कुछ होने का,
350+लिखी भाग्य में जो तेरे बस वही मिलेगी मधुशाला।।७०।
351+
352+कर ले, कर ले कंजूसी तू मुझको देने में हाला,
353+दे ले, दे ले तू मुझको बस यह टूटा फूटा प्याला,
354+मैं तो सब्र इसी पर करता, तू पीछे पछताएगी,
355+जब न रहूँगा मैं, तब मेरी याद करेगी मधुशाला।।७१।
356+
357+ध्यान मान का, अपमानों का छोड़ दिया जब पी हाला,
358+गौरव भूला, आया कर में जब से मिट्टी का प्याला,
359+साकी की अंदाज़ भरी झिड़की में क्या अपमान धरा,
360+दुनिया भर की ठोकर खाकर पाई मैंने मधुशाला।।७२।
361+
362+क्षीण, क्षुद्र, क्षणभंगुर, दुर्बल मानव मिटटी का प्याला,
363+भरी हुई है जिसके अंदर कटु-मधु जीवन की हाला,
364+मृत्यु बनी है निर्दय साकी अपने शत-शत कर फैला,
365+काल प्रबल है पीनेवाला, संसृति है यह मधुशाला।।७३।
366+
367+प्याले सा गढ़ हमें किसी ने भर दी जीवन की हाला,
368+नशा न भाया, ढाला हमने ले लेकर मधु का प्याला,
369+जब जीवन का दर्द उभरता उसे दबाते प्याले से,
370+जगती के पहले साकी से जूझ रही है मधुशाला।।७४।
371+
372+अपने अंगूरों से तन में हमने भर ली है हाला,
373+क्या कहते हो, शेख, नरक में हमें तपाएगी ज्वाला,
374+तब तो मदिरा खूब खिंचेगी और पिएगा भी कोई,
375+हमें नमक की ज्वाला में भी दीख पड़ेगी मधुशाला।।७५।
376+
377+यम आएगा लेने जब, तब खूब चलूँगा पी हाला,
378+पीड़ा, संकट, कष्ट नरक के क्या समझेगा मतवाला,
379+क्रूर, कठोर, कुटिल, कुविचारी, अन्यायी यमराजों के
380+डंडों की जब मार पड़ेगी, आड़ करेगी मधुशाला।।७६।
381+
382+यदि इन अधरों से दो बातें प्रेम भरी करती हाला,
383+यदि इन खाली हाथों का जी पल भर बहलाता प्याला,
384+हानि बता, जग, तेरी क्या है, व्यर्थ मुझे बदनाम न कर,
385+मेरे टूटे दिल का है बस एक खिलौना मधुशाला।।७७।
386+
387+याद न आए दुखमय जीवन इससे पी लेता हाला,
388+जग चिंताओं से रहने को मुक्त, उठा लेता प्याला,
389+शौक, साध के और स्वाद के हेतु पिया जग करता है,
390+पर मै वह रोगी हूँ जिसकी एक दवा है मधुशाला।।७८।
391+
392+गिरती जाती है दिन प्रतिदन प्रणयनी प्राणों की हाला
393+भग्न हुआ जाता दिन प्रतिदन सुभगे मेरा तन प्याला,
394+रूठ रहा है मुझसे रूपसी, दिन दिन यौवन का साकी
395+सूख रही है दिन दिन सुन्दरी, मेरी जीवन मधुशाला।।७९।
396+
397+यम आयेगा साकी बनकर साथ लिए काली हाला,
398+पी न होश में फिर आएगा सुरा-विसुध यह मतवाला,
399+यह अंतिम बेहोशी, अंतिम साकी, अंतिम प्याला है,
400+पथिक, प्यार से पीना इसको फिर न मिलेगी मधुशाला।८०।
401+
402+ढलक रही है तन के घट से, संगिनी जब जीवन हाला
403+पत्र गरल का ले जब अंतिम साकी है आनेवाला,
404+हाथ स्पर्श भूले प्याले का, स्वाद सुरा जीव्हा भूले
405+कानो में तुम कहती रहना, मधु का प्याला मधुशाला।।८१।
406+
407+मेरे अधरों पर हो अंतिम वस्तु न तुलसीदल प्याला
408+मेरी जीव्हा पर हो अंतिम वस्तु न गंगाजल हाला,
409+मेरे शव के पीछे चलने वालों याद इसे रखना
410+राम नाम है सत्य न कहना, कहना सच्ची मधुशाला।।८२।
411+
412+मेरे शव पर वह रोये, हो जिसके आंसू में हाला
413+आह भरे वो, जो हो सुरिभत मदिरा पी कर मतवाला,
414+दे मुझको वो कान्धा जिनके पग मद डगमग होते हों
415+और जलूं उस ठौर जहां पर कभी रही हो मधुशाला।।८३।
416+
417+और चिता पर जाये उंढेला पात्र न घ्रित का, पर प्याला
418+कंठ बंधे अंगूर लता में मध्य न जल हो, पर हाला,
419+प्राण प्रिये यदि श्राध करो तुम मेरा तो ऐसे करना
420+पीने वालों को बुलवा कऱ खुलवा देना मधुशाला।।८४।
421+
422+नाम अगर कोई पूछे तो, कहना बस पीनेवाला
423+काम ढालना, और ढालना सबको मदिरा का प्याला,
424+जाति प्रिये, पूछे यदि कोई कह देना दीवानों की
425+धर्म बताना प्यालों की ले माला जपना मधुशाला।।८५।
426+
427+ज्ञात हुआ यम आने को है ले अपनी काली हाला,
428+पंडित अपनी पोथी भूला, साधू भूल गया माला,
429+और पुजारी भूला पूजा, ज्ञान सभी ज्ञानी भूला,
430+किन्तु न भूला मरकर के भी पीनेवाला मधुशाला।।८६।
431+
432+यम ले चलता है मुझको तो, चलने दे लेकर हाला,
433+चलने दे साकी को मेरे साथ लिए कर में प्याला,
434+स्वर्ग, नरक या जहाँ कहीं भी तेरा जी हो लेकर चल,
435+ठौर सभी हैं एक तरह के साथ रहे यदि मधुशाला।।८७।
436+
437+पाप अगर पीना, समदोषी तो तीनों - साकी बाला,
438+नित्य पिलानेवाला प्याला, पी जानेवाली हाला,
439+साथ इन्हें भी ले चल मेरे न्याय यही बतलाता है,
440+कैद जहाँ मैं हूँ, की जाए कैद वहीं पर मधुशाला।।८८।
441+
442+शांत सकी हो अब तक, साकी, पीकर किस उर की ज्वाला,
443+'और, और' की रटन लगाता जाता हर पीनेवाला,
444+कितनी इच्छाएँ हर जानेवाला छोड़ यहाँ जाता!
445+कितने अरमानों की बनकर कब्र खड़ी है मधुशाला।।८९।
446+
447+जो हाला मैं चाह रहा था, वह न मिली मुझको हाला,
448+जो प्याला मैं माँग रहा था, वह न मिला मुझको प्याला,
449+जिस साकी के पीछे मैं था दीवाना, न मिला साकी,
450+जिसके पीछे था मैं पागल, हा न मिली वह मधुशाला!।९०।
451+
452+देख रहा हूँ अपने आगे कब से माणिक-सी हाला,
453+देख रहा हूँ अपने आगे कब से कंचन का प्याला,
454+'बस अब पाया!'- कह-कह कब से दौड़ रहा इसके पीछे,
455+किंतु रही है दूर क्षितिज-सी मुझसे मेरी मधुशाला।।९१।
456+
457+कभी निराशा का तम घिरता, छिप जाता मधु का प्याला,
458+छिप जाती मदिरा की आभा, छिप जाती साकीबाला,
459+कभी उजाला आशा करके प्याला फिर चमका जाती,
460+आँख मिचौली खेल रही है मुझसे मेरी मधुशाला।।९२।
461+
462+'आ आगे' कहकर कर पीछे कर लेती साकीबाला,
463+होंठ लगाने को कहकर हर बार हटा लेती प्याला,
464+नहीं मुझे मालूम कहाँ तक यह मुझको ले जाएगी,
465+बढ़ा बढ़ाकर मुझको आगे, पीछे हटती मधुशाला।।९३।
466+
467+हाथों में आने-आने में, हाय, फिसल जाता प्याला,
468+अधरों पर आने-आने में हाय, ढुलक जाती हाला,
469+दुनियावालो, आकर मेरी किस्मत की ख़ूबी देखो,
470+रह-रह जाती है बस मुझको मिलते-मिलते मधुशाला।।९४।
471+
472+प्राप्य नही है तो, हो जाती लुप्त नहीं फिर क्यों हाला,
473+प्राप्य नही है तो, हो जाता लुप्त नहीं फिर क्यों प्याला,
474+दूर न इतनी हिम्मत हारुँ, पास न इतनी पा जाऊँ,
475+व्यर्थ मुझे दौड़ाती मरु में मृगजल बनकर मधुशाला।।९५।
476+
477+मिले न, पर, ललचा ललचा क्यों आकुल करती है हाला,
478+मिले न, पर, तरसा तरसाकर क्यों तड़पाता है प्याला,
479+हाय, नियति की विषम लेखनी मस्तक पर यह खोद गई
480+'दूर रहेगी मधु की धारा, पास रहेगी मधुशाला!'।९६।
481+
482+मदिरालय में कब से बैठा, पी न सका अब तक हाला,
483+यत्न सहित भरता हूँ, कोई किंतु उलट देता प्याला,
484+मानव-बल के आगे निर्बल भाग्य, सुना विद्यालय में,
485+'भाग्य प्रबल, मानव निर्बल' का पाठ पढ़ाती मधुशाला।।९७।
486+
487+किस्मत में था खाली खप्पर, खोज रहा था मैं प्याला,
488+ढूँढ़ रहा था मैं मृगनयनी, किस्मत में थी मृगछाला,
489+किसने अपना भाग्य समझने में मुझसा धोखा खाया,
490+किस्मत में था अवघट मरघट, ढूँढ़ रहा था मधुशाला।।९८।
491+
492+उस प्याले से प्यार मुझे जो दूर हथेली से प्याला,
493+उस हाला से चाव मुझे जो दूर अधर से है हाला,
494+प्यार नहीं पा जाने में है, पाने के अरमानों में!
495+पा जाता तब, हाय, न इतनी प्यारी लगती मधुशाला।।९९।
496+
497+साकी के पास है तनिक सी श्री, सुख, संपित की हाला,
498+सब जग है पीने को आतुर ले ले किस्मत का प्याला,
499+रेल ठेल कुछ आगे बढ़ते, बहुतेरे दबकर मरते,
500+जीवन का संघर्ष नहीं है, भीड़ भरी है मधुशाला।।१००।
501+
502+साकी, जब है पास तुम्हारे इतनी थोड़ी सी हाला,
503+क्यों पीने की अभिलषा से, करते सबको मतवाला,
504+हम पिस पिसकर मरते हैं, तुम छिप छिपकर मुसकाते हो,
505+हाय, हमारी पीड़ा से है क्रीड़ा करती मधुशाला।।१०१।
506+
507+साकी, मर खपकर यदि कोई आगे कर पाया प्याला,
508+पी पाया केवल दो बूंदों से न अधिक तेरी हाला,
509+जीवन भर का, हाय, पिरश्रम लूट लिया दो बूंदों ने,
510+भोले मानव को ठगने के हेतु बनी है मधुशाला।।१०२।
511+
512+जिसने मुझको प्यासा रक्खा बनी रहे वह भी हाला,
513+जिसने जीवन भर दौड़ाया बना रहे वह भी प्याला,
514+मतवालों की जिह्वा से हैं कभी निकलते शाप नहीं,
515+दुखी बनाया जिसने मुझको सुखी रहे वह मधुशाला!।१०३।
516+
517+नहीं चाहता, आगे बढ़कर छीनूँ औरों की हाला,
518+नहीं चाहता, धक्के देकर, छीनूँ औरों का प्याला,
519+साकी, मेरी ओर न देखो मुझको तनिक मलाल नहीं,
520+इतना ही क्या कम आँखों से देख रहा हूँ मधुशाला।।१०४।
521+
522+मद, मदिरा, मधु, हाला सुन-सुन कर ही जब हूँ मतवाला,
523+क्या गति होगी अधरों के जब नीचे आएगा प्याला,
524+साकी, मेरे पास न आना मैं पागल हो जाऊँगा,
525+प्यासा ही मैं मस्त, मुबारक हो तुमको ही मधुशाला।।१०५।
526+
527+क्या मुझको आवश्यकता है साकी से माँगूँ हाला,
528+क्या मुझको आवश्यकता है साकी से चाहूँ प्याला,
529+पीकर मदिरा मस्त हुआ तो प्यार किया क्या मदिरा से!
530+मैं तो पागल हो उठता हूँ सुन लेता यदि मधुशाला।।१०६।
531+
532+देने को जो मुझे कहा था दे न सकी मुझको हाला,
533+देने को जो मुझे कहा था दे न सका मुझको प्याला,
534+समझ मनुज की दुर्बलता मैं कहा नहीं कुछ भी करता,
535+किन्तु स्वयं ही देख मुझे अब शरमा जाती मधुशाला।।१०७।
536+
537+एक समय संतुष्ट बहुत था पा मैं थोड़ी-सी हाला,
538+भोला-सा था मेरा साकी, छोटा-सा मेरा प्याला,
539+छोटे-से इस जग की मेरे स्वर्ग बलाएँ लेता था,
540+विस्तृत जग में, हाय, गई खो मेरी नन्ही मधुशाला!।१०८।
541+
542+बहुतेरे मदिरालय देखे, बहुतेरी देखी हाला,
543+भाँति भाँति का आया मेरे हाथों में मधु का प्याला,
544+एक एक से बढ़कर, सुन्दर साकी ने सत्कार किया,
545+जँची न आँखों में, पर, कोई पहली जैसी मधुशाला।।१०९।
546+
547+एक समय छलका करती थी मेरे अधरों पर हाला,
548+एक समय झूमा करता था मेरे हाथों पर प्याला,
549+एक समय पीनेवाले, साकी आलिंगन करते थे,
550+आज बनी हूँ निर्जन मरघट, एक समय थी मधुशाला।।११०।
551+
552+जला हृदय की भट्टी खींची मैंने आँसू की हाला,
553+छलछल छलका करता इससे पल पल पलकों का प्याला,
554+आँखें आज बनी हैं साकी, गाल गुलाबी पी होते,
555+कहो न विरही मुझको, मैं हूँ चलती फिरती मधुशाला!।१११।
556+
557+कितनी जल्दी रंग बदलती है अपना चंचल हाला,
558+कितनी जल्दी घिसने लगता हाथों में आकर प्याला,
559+कितनी जल्दी साकी का आकर्षण घटने लगता है,
560+प्रात नहीं थी वैसी, जैसी रात लगी थी मधुशाला।।११२।
561+
562+बूँद बूँद के हेतु कभी तुझको तरसाएगी हाला,
563+कभी हाथ से छिन जाएगा तेरा यह मादक प्याला,
564+पीनेवाले, साकी की मीठी बातों में मत आना,
565+मेरे भी गुण यों ही गाती एक दिवस थी मधुशाला।।११३।
566+
567+छोड़ा मैंने पथ मतों को तब कहलाया मतवाला,
568+चली सुरा मेरा पग धोने तोड़ा जब मैंने प्याला,
569+अब मानी मधुशाला मेरे पीछे पीछे फिरती है,
570+क्या कारण? अब छोड़ दिया है मैंने जाना मधुशाला।।११४।
571+
572+यह न समझना, पिया हलाहल मैंने, जब न मिली हाला,
573+तब मैंने खप्पर अपनाया ले सकता था जब प्याला,
574+जले हृदय को और जलाना सूझा, मैंने मरघट को
575+अपनाया जब इन चरणों में लोट रही थी मधुशाला।।११५।
576+
577+कितनी आई और गई पी इस मदिरालय में हाला,
578+टूट चुकी अब तक कितने ही मादक प्यालों की माला,
579+कितने साकी अपना अपना काम खतम कर दूर गए,
580+कितने पीनेवाले आए, किन्तु वही है मधुशाला।।११६।
581+
582+कितने होठों को रक्खेगी याद भला मादक हाला,
583+कितने हाथों को रक्खेगा याद भला पागल प्याला,
584+कितनी शक्लों को रक्खेगा याद भला भोला साकी,
585+कितने पीनेवालों में है एक अकेली मधुशाला।।११७।
586+
587+दर दर घूम रहा था जब मैं चिल्लाता - हाला! हाला!
588+मुझे न मिलता था मदिरालय, मुझे न मिलता था प्याला,
589+मिलन हुआ, पर नहीं मिलनसुख लिखा हुआ था किस्मत में,
590+मैं अब जमकर बैठ गया हूँ, घूम रही है मधुशाला।।११८।
591+
592+मैं मदिरालय के अंदर हूँ, मेरे हाथों में प्याला,
593+प्याले में मदिरालय बिंबित करनेवाली है हाला,
594+इस उधेड़-बुन में ही मेरा सारा जीवन बीत गया -
595+मैं मधुशाला के अंदर या मेरे अंदर मधुशाला!।११९।
596+
597+किसे नहीं पीने से नाता, किसे नहीं भाता प्याला,
598+इस जगती के मदिरालय में तरह-तरह की है हाला,
599+अपनी-अपनी इच्छा के अनुसार सभी पी मदमाते,
600+एक सभी का मादक साकी, एक सभी की मधुशाला।।१२०।
601+
602+वह हाला, कर शांत सके जो मेरे अंतर की ज्वाला,
603+जिसमें मैं बिंबित-प्रतिबिंबित प्रतिपल, वह मेरा प्याला,
604+मधुशाला वह नहीं जहाँ पर मदिरा बेची जाती है,
605+भेंट जहाँ मस्ती की मिलती मेरी तो वह मधुशाला।।१२१।
606+
607+मतवालापन हाला से ले मैंने तज दी है हाला,
608+पागलपन लेकर प्याले से, मैंने त्याग दिया प्याला,
609+साकी से मिल, साकी में मिल अपनापन मैं भूल गया,
610+मिल मधुशाला की मधुता में भूल गया मैं मधुशाला।।१२२।
611+
612+मदिरालय के द्वार ठोंकता किस्मत का छूंछा प्याला,
613+गहरी, ठंडी सांसें भर भर कहता था हर मतवाला,
614+कितनी थोड़ी सी यौवन की हाला, हा, मैं पी पाया!
615+बंद हो गई कितनी जल्दी मेरी जीवन मधुशाला।।१२३।
616+
617+कहाँ गया वह स्वर्गिक साकी, कहाँ गयी सुरिभत हाला,
618+कहाँ गया स्वपिनल मदिरालय, कहाँ गया स्वर्णिम प्याला!
619+पीनेवालों ने मदिरा का मूल्य, हाय, कब पहचाना?
620+फूट चुका जब मधु का प्याला, टूट चुकी जब मधुशाला।।१२४।
621+
622+अपने युग में सबको अनुपम ज्ञात हुई अपनी हाला,
623+अपने युग में सबको अदभुत ज्ञात हुआ अपना प्याला,
624+फिर भी वृद्धों से जब पूछा एक यही उत्तर पाया -
625+अब न रहे वे पीनेवाले, अब न रही वह मधुशाला!।१२५।
626+
627+'मय' को करके शुद्ध दिया अब नाम गया उसको, 'हाला'
628+'मीना' को 'मधुपात्र' दिया 'सागर' को नाम गया 'प्याला',
629+क्यों न मौलवी चौंकें, बिचकें तिलक-त्रिपुंडी पंडित जी
630+'मय-महिफल' अब अपना ली है मैंने करके 'मधुशाला'।।१२६।
631+
632+कितने मर्म जता जाती है बार-बार आकर हाला,
633+कितने भेद बता जाता है बार-बार आकर प्याला,
634+कितने अर्थों को संकेतों से बतला जाता साकी,
635+फिर भी पीनेवालों को है एक पहेली मधुशाला।।१२७।
636+
637+जितनी दिल की गहराई हो उतना गहरा है प्याला,
638+जितनी मन की मादकता हो उतनी मादक है हाला,
639+जितनी उर की भावुकता हो उतना सुन्दर साकी है,
640+जितना ही जो रिसक, उसे है उतनी रसमय मधुशाला।।१२८।
641+
642+जिन अधरों को छुए, बना दे मस्त उन्हें मेरी हाला,
643+जिस कर को छू दे, कर दे विक्षिप्त उसे मेरा प्याला,
644+आँख चार हों जिसकी मेरे साकी से दीवाना हो,
645+पागल बनकर नाचे वह जो आए मेरी मधुशाला।।१२९।
646+
647+हर जिव्हा पर देखी जाएगी मेरी मादक हाला
648+हर कर में देखा जाएगा मेरे साकी का प्याला
649+हर घर में चर्चा अब होगी मेरे मधुविक्रेता की
650+हर आंगन में गमक उठेगी मेरी सुरिभत मधुशाला।।१३०।
651+
652+मेरी हाला में सबने पाई अपनी-अपनी हाला,
653+मेरे प्याले में सबने पाया अपना-अपना प्याला,
654+मेरे साकी में सबने अपना प्यारा साकी देखा,
655+जिसकी जैसी रुचि थी उसने वैसी देखी मधुशाला।।१३१।
656+
657+यह मदिरालय के आँसू हैं, नहीं-नहीं मादक हाला,
658+यह मदिरालय की आँखें हैं, नहीं-नहीं मधु का प्याला,
659+किसी समय की सुखदस्मृति है साकी बनकर नाच रही,
660+नहीं-नहीं कवि का हृदयांगण, यह विरहाकुल मधुशाला।।१३२।
661+
662+कुचल हसरतें कितनी अपनी, हाय, बना पाया हाला,
663+कितने अरमानों को करके ख़ाक बना पाया प्याला!
664+पी पीनेवाले चल देंगे, हाय, न कोई जानेगा,
665+कितने मन के महल ढहे तब खड़ी हुई यह मधुशाला!।१३३।
666+
667+विश्व तुम्हारे विषमय जीवन में ला पाएगी हाला
668+यदि थोड़ी-सी भी यह मेरी मदमाती साकीबाला,
669+शून्य तुम्हारी घड़ियाँ कुछ भी यदि यह गुंजित कर पाई,
670+जन्म सफल समझेगी जग में अपना मेरी मधुशाला।।१३४।
671+
672+बड़े-बड़े नाज़ों से मैंने पाली है साकीबाला,
673+कलित कल्पना का ही इसने सदा उठाया है प्याला,
674+मान-दुलारों से ही रखना इस मेरी सुकुमारी को,
675+विश्व, तुम्हारे हाथों में अब सौंप रहा हूँ मधुशाला।।१३५।
676+
677+पिरिशष्ट से
678+
679+स्वयं नहीं पीता, औरों को, किन्तु पिला देता हाला,
680+स्वयं नहीं छूता, औरों को, पर पकड़ा देता प्याला,
681+पर उपदेश कुशल बहुतेरों से मैंने यह सीखा है,
682+स्वयं नहीं जाता, औरों को पहुंचा देता मधुशाला।
683+
684+मैं कायस्थ कुलोदभव मेरे पुरखों ने इतना ढ़ाला,
685+मेरे तन के लोहू में है पचहत्तर प्रतिशत हाला,
686+पुश्तैनी अधिकार मुझे है मदिरालय के आँगन पर,
687+मेरे दादों परदादों के हाथ बिकी थी मधुशाला।
688+
689+बहुतों के सिर चार दिनों तक चढ़कर उतर गई हाला,
690+बहुतों के हाथों में दो दिन छलक झलक रीता प्याला,
691+पर बढ़ती तासीर सुरा की साथ समय के, इससे ही
692+और पुरानी होकर मेरी और नशीली मधुशाला।
693+
694+पितृ पक्ष में पुत्र उठाना अर्ध्य न कर में, पर प्याला
695+बैठ कहीं पर जाना, गंगा सागर में भरकर हाला
696+किसी जगह की मिटटी भीगे, तृप्ति मुझे मिल जाएगी
697+तर्पण अर्पण करना मुझको, पढ़ पढ़ कर के मधुशाला।
698+
699+- बच्चन